हिमालय संवाद डेस्क । आज के बच्चों में अपनी क्षमताओं को लेकर गजब का आत्मविश्वास है। हालांकि, कई बार पेरेंट्स की अपेक्षाओं का बोझ इस विश्वाश को हिला भी देता है। यह बात परीक्षा में प्रदर्शन पर भी लागू होती है। तनाव के इस चक्र को तोड़ने में आप कैसे सक्रिय भूमिका निभाएं, बता रही हैं दिव्या नायक अनीता राव 15 साल के बेटे की मां है और बेटे की आगामी बोर्ड परीक्षाओं की वजह से तनाव से जूझ रही हैं।
बेटे की मदद के लिए उन्होंने न केवल नौकरी से एक माह की छुट्टी ली है, बल्कि उसके खानपान से लेकर नींद और स्क्रीन टाइम तक का ब्योरा रख रही हैं। सिन्हा परिवार में भी माहौल तनावपूर्ण है। 16 साल की आशी सिन्हा कहती हैं, ‘घर में मेरी हर गतिविधि पर कड़ी नजर रखी जा रही है। मेरा फोन ले लिया गया है। मुझसे परिवार वालों की अपेक्षाएं कुछ ज्यादा ही हैं। कभी-कभी तो मुझे बोर्ड परीक्षा के अपने खराब परिणाम से जुड़े बुरे सपने भी आते हैं।
इस साल सीबीएसई, आईसीएसई और विभिन्न राज्यों द्वारा संचालित दसवीं और बारहवीं की बोर्ड परीक्षाओं में अंदाजन डेढ़ करोड़ से ज्यादा छात्र हिस्सा लेंगे। अन्य कक्षाओं के बच्चे भी आने वाले सप्ताह में अपनी फाइनल परीक्षा देंगे। इन परीक्षाओं की वजह से फरवरी-मार्च का समय भारत में स्कूली बच्चों के लिए हमेशा से तनाव भरा होता है। परीक्षा में असफलता का डर या फिर घरवालों की अपेक्षाओं पर खरा न उतर पाने का डर, इन बच्चों को अपनी क्षमता के अनुरूप प्रदर्शन करने से न सिर्फ रोकता है, बल्कि कई दफा गलत कदम उठाने पर भी मजबूर कर देता है।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक 2023 में 13,892 भारतीय छात्रों ने आत्महत्या की थी, जो पिछले दशक में सबसे अधिक है। एनसीईआरटी की ‘मेंटल हेल्थ एंड वेलबीइंग ऑफ स्कूल स्टूडेंट्स’ नाम के सर्वे के मुताबिक भारत में लगभग 80% मिडिल और सेकेंडरी स्कूल के विद्यार्थी परीक्षा, परिणाम और अकादमिक दबाव को लेकर एंग्जायटी महसूस करते हैं। छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और करिअर मार्गदर्शन को मजबूत करने के लिए हाल ही में सीबीएसई मान्यता प्राप्त सभी स्कूलों में मेंटल हेल्थ काउंसलर और करिअर काउंसलर की सेवाओं को अनिवार्य कर दिया गया है।
परीक्षा और तनाव का कनेक्शन
आपके बच्चे के लिए परीक्षा की परिभाषा क्या है, यह मुख्य रूप से इसके कारण उसे होने वाले तनाव का मुख्य आधार है। कई छात्र परीक्षाओं को केवल अपनी शैक्षणिक क्षमता का ही नहीं, बल्कि एक व्यक्ति के रूप में अपनी पूरी योग्यता का मूल्यांकन मानते हैं। परिवार, दोस्त, स्कूल और आसपास का माहौल उनकी इस सोच के लिए जिम्मेदार होता है।
मुंबई में कंसल्टेंट साइकोलॉजिस्ट डॉ. शीबा सिंह कहती हैं, ‘असफलता का डर, भविष्य को लेकर असमंजस और परीक्षा में अच्छे प्रदर्शन के लिए घरवालों का दबाव बच्चों में बढ़े रहे तनाव के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार होता है। जो बच्चे पढ़ाई में बहुत अच्छे होते हैं, वे एक या दो नंबर कम आने को भी अपनी अयोग्यता से जोड़ देते हैं। वहीं पढ़ाई में औसत या कमजोर बच्चे अपने भविष्य और करिअर को लेकर चिंतित रहते हैं।
भारत में अक्सर माज-पिता अपने बच्चे की पढ़ाई के लिए लोन लेना, कोचिंग का खर्च उठाना, नौकरी बदलना या शहर बदलना जैसी कुर्बानियां भी करते हैं। हालांकि इन सभी कदमों का उद्देश्य अच्छा होता है, लेकिन बच्चों पर अप्रत्यक्ष दबाव बन जाता है, जिससे उनकी परीक्षा-संबंधित चिंता और बढ़ जाती है।
अपेक्षाओं और क्षमताओं का असंतुलन
पेरेटिंग कंसल्टेंट डॉ. देबमिता दत्ता के मुताबिक भारतीय अभिभावक अपने बच्चों को इस सोच के साथ बड़ा करते हैं कि उनका भविष्य और समाज में उनकी हैसियत बोर्ड परीक्षा के उनके परिणाम पर आधारित है। आज भी अभिभावकों के बड़े तबके के लिए सफलता की एक तय परिभाषा है और वे अपने बच्चे को उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जाने-अनजाने धकेलते रहते हैं।
वे अपनी अपेक्षाओं और बच्चे की क्षमताओं के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश नहीं करते। यह असंतुलन बच्चे के ऊपर तनाव का बोझ बढ़ाता जाता है। डॉ. दत्ता के मुताबिक परीक्षा को लेकर बच्चे मुख्य रूप से तीन बातों की वजह से तनाव में आते हैं: अगर मेरे नंबर अच्छे नहीं आए तो मम्मी-पापा मुझे प्यार नहीं करेंगे, दोस्त मेरे साथ दोस्ती खत्म कर देंगे और स्कूल में अनदेखा किया जाएगा। ये सभी बच्चे के तनाव को बढ़ा देते हैं।
पहचानिए, तनाव के लक्षण
1 – बहुत ज्यादा चिंता करना, ध्यान केंद्रित करने में परेशानी, बेचैनी और चिडचिड़ापन आदि परीक्षा के तनाव के मनोवैज्ञानिक लक्षण हैं।अधिकांश अभिभावक यह शिकायत करते हैं कि उनका बच्चा परीक्षा के लिए रिवीजन इसलिए पूरा नहीं कर पाता, क्योंकि वह चैन से कुछ देर एक जगह बैठ ही नहीं पा रहा है।
2 – इस तनाव का शारीरिक लक्षण हथेलियों और तलवों में पसीना आना है। तनाव की वजह से कुछ बच्चों को मुंह बार – बार सूख जाता जाता है , इसलिए वे पानी ज्यादा मात्रा में पीते हैं । पेट में दर्द , उल्टी ,चक्कर आना ,बेहोश होना और दिल घबराना आदि भी बहूत ज्यादा तनाव के लक्षण हैं।
3 – पढाई से बचना और सोशल मीडिया व गेम खेलने में ज्यादा वक्त बिताना , विद्रोही स्वभाव का हो जाना , रोना , गुस्सा , लाचारगी , आत्मविश्वास में कमी , परीक्षा देना से बेचना और परीक्षा के दौरान बेहोश हो जाना भी परीक्षा के कारण होने वाले तनाव के लक्षण है।
तनाव से उबरने के तरीके
संतुलित रूटीनः- परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन के लिए रुटीन तो कारगर है ही, इस वजह से होने वाले तनाव से उबरने में भी रूटीन की भूमिका कम नहीं। अपने बच्चे के लिए आप या बच्चा जो भी शेड्यल बनाए, उसमें पढ़ाई के साथ-साथ व्यायाम और आराम व मनोरंजन को भी शामिल करें।
व्यायाम और हैप्पी हार्मोनः- परीक्षा की तैयारियों के बीच व्यायाम की भूमिका और बढ़ जाती है। व्यायाम से न सिर्फ उनमें ऊर्जा का संचार होता है बल्कि सेरोटोनिन, डोपामाइन, एंडोर्फिन और ऑक्सीटोसिन जैसे ‘हैप्पी हार्मोन’ का स्राव भी बढ़ता है। इनकी वजह से बच्चे का मूड अच्छा रहता है और तनाव कम होता है।
पढ़ाई के बीच ब्रेकः-कोई भी बच्चा लगातार पढ़ाई नहीं कर सकता। स्मार्टफोन छीन लेने या टीवी देखने पर पांबदी लगाकर आप बच्चे को किसी तरह की मदद नहीं पहुंचा रहीं। परीक्षा की तैयारी से ब्रेक लेकर टीवी पर कुछ देखने, झपकी लेने, दोस्तों या परिवार वालों के साथ गप्पे लगाने
या फिर अपनी पसंद को कोई और काम कुछ देर करने से उसका तनाव कम होगा और वह दोबारा पूरी ऊर्जा के साथ पढ़ाई कर पाएगा।
स्कूल और काउंसलर की मदद:- स्कूल भी परीक्षा के कारण उपजे तनाव का बेहतर तरीके से सामना करने में अभिभावक की मदद कर सकते हैं। अगर बच्चा बहुत ज्यादा तनाव में है, तो इस मामले में स्कूल काउंसलर से बात करें। पढ़ाई की सेहतमंद आदतें बच्चे में वकसित करने में वे आपकी मदद कर सकते हैं। आपको सफलता और असफलता दोनों स्थिति में अपने बच्चे का सपोर्ट सिस्टम बनना होगा।
पढ़ाई की सही आदतें:- बच्चे को तैयारी के मामले में टालमटोल से दूर रहने, हर दिन पढ़ाई करने और परिणाम की चिंता करने की जगह सीखने पर ज्यादा ध्यान लगाने के लिए प्रेरित करें। बच्चे को पुराने प्रश्न पत्र हल करने की सलाह दें। इससे बच्चे धीरे-धीरे परीक्षा के तनाव के प्रति अभ्यस्त हो जाते हैं और जब असली परीक्षा आती है, तो उन्हें चिंता और तनाव कम होता है।
अच्छी नींद: -परीक्षा के कारण उपजे तनाव का सामना करने में अच्छी नींद सबसे प्रभावी हथियार है। बच्चे को परीक्षा के आसपास वाले दिनों में भी सात से आठ घंटे की नींद लेने के लिए प्रोत्साहित करें।
प्राणायाम और श्वास अभ्यास:-अनुलोम- विलोम जैसे प्राणायाम को बच्चे की दिनचर्या का हिस्सा बनाएं। पढ़ने के लिए बैठने से पहले या फिर परीक्षा शुरू होने से पहले सांस से जुड़े व्यायाम करने से वह तनाव पर काबू पाकर परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन में अपनी सारी ऊर्जा लगा पाएगा।
सामाजिक जुड़ाव :- दुनिया से एकदम अलग-थलग होकर पढ़ाई में डूब जाने से बच्चे का तनाव कम नहीं होता बल्कि बढ़ता है। परीक्षा की तैयारियों के बीच भी बच्चे को दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलने व बातें करने के लिए प्रेरित करें। बच्चा अगर परीक्षा को लेकर बहुत ज्यादा तनाव में है, तो इस मामले में मनोविशेषज्ञ या काउंसलर की मदद लेने से न हिचकें।




