मेदांता गुरुग्राम का दावा: 90% सफलता दर के साथ लंग ट्रांसप्लांट में रच रहा है नए कीर्तिमान

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मेदांता गुरुग्राम का दावा: 90% सफलता दर के साथ लंग ट्रांसप्लांट में रच रहा है नए कीर्तिमान

हिमालय संवाद डेस्क। जैसे-जैसे फेफड़ों की गंभीर बीमारियों का बोझ बढ़ रहा है, लंग ट्रांसप्लांट (फेफड़ा प्रत्यारोपण) उन मरीजों के लिए एक जीवन रक्षक विकल्प के रूप में उभर रहा है जो सांस की गंभीर स्थितियों से पीड़ित हैं और उपचार के अन्य सभी विकल्प आजमा चुके हैं। कभी इसे एक अत्यधिक विशिष्ट प्रक्रिया माना जाता था जो वैश्विक स्तर पर केवल चुनिंदा केंद्रों में ही उपलब्ध थी, लेकिन गुरुग्राम स्थित मेदांता – द मेडिसिटी ने हमारे देश में लंग ट्रांसप्लांट को आगे बढ़ाने में अग्रणी भूमिका निभाई है। उल्लेखनीय है कि मेदांता को न्यूजवीक द्वारा वर्ष 2026 में भारत का सर्वश्रेष्ठ अस्पताल चुना गया है।

उत्तर भारत का पहला लंग ट्रांसप्लांट कार्यक्रम और 90% सफलता दर
मेदांता अस्पताल ने उत्तर भारत में पहला लंग ट्रांसप्लांट कार्यक्रम स्थापित किया था और आज यह 90% से अधिक की सफलता दर दर्ज करता है। एक बेहद अनुभवी बहुविषयक (मल्टी-डिसिप्लिनरी) टीम के माध्यम से यह एंड-स्टेज लंग डिजीज से पीड़ित मरीजों को व्यापक देखभाल प्रदान करता है, जिनमें मुख्य रूप से शामिल हैं:

  • अत्यधिक गंभीर इंटरस्टिशियल लंग डिजीज (ILD)
  • क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD)
  • सिस्टिक फाइब्रोसिस
  • पल्मोनरी आर्टेरियल हाइपरटेंशन

सही समय पर सही निर्णय है जरूरी: डॉ. विवेक सिंह
क्रिटिकल केयर सोसाइटी (अमृतसर) के सहयोग से मेदांता द्वारा अमृतसर में आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए, मेदांता गुरुग्राम में रेस्पिरेटरी एंड स्लीप मेडिसिन विभाग के डिरेक्टर डॉ. विवेक सिंह ने कहा:

“लंग ट्रांसप्लांट पर तब विचार किया जाना चाहिए जब फेफड़ों की कार्यक्षमता उस स्तर तक गिर जाए जहाँ जीवन की गुणवत्ता से गंभीर समझौता हो और किसी बड़े हस्तक्षेप के बिना जीवन प्रत्याशा सीमित हो जाए। समय पर रेफरल, सावधानीपूर्वक मरीज के चयन और ट्रांसप्लांट के बाद की व्यापक देखभाल के साथ, लंग ट्रांसप्लांट मरीज की गतिशीलता व स्वतंत्रता को बहाल कर सकता है और जीवित रहने की दर में काफी सुधार कर सकता है।”

जोखिम और चिकित्सा विज्ञान में प्रगति
सभी बड़े ट्रांसप्लांट की तरह, लंग ट्रांसप्लांट में भी कुछ जोखिम शामिल होते हैं, जैसे:

  • ऑर्गन रिजेक्शन (शरीर द्वारा नए अंग को स्वीकार न करना)
  • लंबे समय तक चलने वाली इम्यूनोसप्रेसेरिव थेरेपी के कारण संक्रमण (Infection)
  • रक्त के थक्के जमना और ऑपरेशन के बाद की अन्य जटिलताएं

डॉ. सिंह ने आगे आश्वस्त करते हुए कहा, “हालांकि, पिछले दशक में सर्जिकल तकनीकों, क्रिटिकल केयर और ट्रांसप्लांट के बाद की निगरानी में हुई प्रगति से परिणामों में लगातार सुधार हुआ है और जोखिम काफी कम हुए हैं।”

थोरैसिक सर्जरी में आधुनिक तकनीकों का प्रभुत्व: डॉ. हर्ष वर्धन पुरी
मेदांता गुरुग्राम के ‘इंस्टीट्यूट ऑफ चेस्ट सर्जरी, चेस्ट ऑन्को-सर्जरी एंड लंग ट्रांसप्लांट’ के वरिष्ठ कंसलटेंट डॉ. हर्ष वर्धन पुरी ने फेफड़े, अन्नप्रणाली (ईसोफेगस) और मीडियास्टिनल रोगों के लिए उन्नत सर्जिकल हस्तक्षेपों पर प्रकाश डाला। मेदांता आज मुख्य रूप से दो अत्याधुनिक तकनीकों का नेतृत्व कर रहा है:

VATS (वीडियो-असिस्टेड थोरैसिक सर्जरी): यह एक मिनिमली इनवेसिव (कम चीरे वाली) तकनीक है जिसमें जटिल छाती प्रक्रियाओं को करने के लिए छोटे चीरों और विशेष कैमरों का उपयोग किया जाता है।

रोबोटिक-असिस्टेड थोरैसिक सर्जरी: यह तकनीक बेहतर सटीकता व दक्षता के साथ हाई-डेफिनिशन 3D विज़ुअलाइज़ेशन को जोड़ती है।

इन आधुनिक तकनीकों के फायदे:

  • मरीज को बहुत कम दर्द होता है।
  • जटिलताओं की दर न्यूनतम हो जाती है।
  • मरीज की रिकवरी (स्वस्थ होने की गति) बेहद तेजी से होती है।

डॉ. पुरी ने थोरैसिक सर्जरी में आए बदलावों को रेखांकित करते हुए कहा:“आज थोरैसिक सर्जरी में सबसे बड़ा बदलाव जटिल छाती रोगों का शुरुआती चरण में निदान और इलाज करने की क्षमता है। चाहे वह फेफड़ों का कैंसर हो, उन्नत एम्पायमा हो, वायुमार्ग के विकार हों, चेस्ट वॉल ट्यूमर हों या मीडियास्टिनल रोग हों, आधुनिक सर्जिकल दृष्टिकोणों ने रिकवरी के समय को नाटकीय रूप से कम कर दिया है। मेदांता में हमारा बहुविषयक दृष्टिकोण यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक मरीज को व्यक्तिगत उपचार योजना (Personalized Treatment Plan) मिले।”

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